Sunday, 10 June 2018


नमस्कार दोस्तों आज का हमारा चर्चा का विषय एक ऐसे युद्ध पे है जिसके बारे में  हमारे देश में पता नहीं किन कारणों के कारण कभी भी महत्व नहीं दिया गया और इसके बारे में काम लोग ही जानते हैं पर इसे यूरोप के देशों में बहुत महत्व दिया जाता है और स्कूलों में पढाया भी जाता है| जी हाँ दोस्तों में बात कर रहा हूँ सारागढ़ी के युद्ध के बारे में| यह युद्ध ब्रिटिश सेना की  36वि सिख रेजिमेंट और पठानों के बीच लड़ा गया था| तो आईये शुरू करते हैं| 


Monday, 4 June 2018


नमस्कार दोस्तों आपका मेरे ब्लॉग में स्वागत है आज का हमारा चर्चा का विषय उस महान राजा के ऊपर है जिसने भारत वर्ष को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया| जिसके नाम से विदेशी आक्रमणकारियों की रूह कांप उठती थी जिसने विदेशी आक्रमणकारियों  को भारत से ऐसा खदेड़ा की वजह वे 300 साल तक भारत वापस नहीं आए| इस महा योद्धा ने रावलपिंडी की स्थापना की थी जो की वर्तमान पाकिस्तान में है| जी हां दोस्तों मैं बात कर रहा हूं इक्ष्वाकु कुल शिरोमणि सूर्यवंशी महाराज भगवान श्री राम के वंशज मेवाड़ राजवंश के संस्थापक प्रथम मेवाड़ नरेश कालभोज बप्पा रावल जी की|
बप्पा रावल का जन्म सन 700 ईसवीमें चित्रकोट (वर्तमान चित्तौड़गढ़) में हुआ था| इनके पिता का नाम रावल नागभट्टसिंह था और माता का नाम चारू मीका सिंह| आप सोच रहे होंगे कि बप्पा रावल के तो पिता भी थे फिर बप्पा रावल  क्यों मेवाड़ राजवंश का संस्थापक बोला जाता है|

मित्रों इसका कारण यह है कि चित्रांगद गौरी नाम के एक राजा ने छल से बप्पारावल के पिता की हत्या कर दी और मेवाड़ में आग लगा दी और मेवाड़ का राजा बन बैठा| उसे लगा कि अब पूरा मेवाड़ राजवंश मर गया होगा| पर ऐसा नहीं था| कुछ सैनिकों ने रानी को गुप्त मार्ग से महल से बाहर भेज दिया| इस कठिन समय में नारंग नाम के ऋषि ने रानी को अपने आश्रम में शरण दी| इस हादसे के बाद चित्रांगद गौरी ने यह खबर फैला दी कि मेवाड़ राजवंश अब समाप्त हो चुका है| पर उसे क्या पता था उसका काल उसकी प्रतीक्षा कर रहा है| नारंग ऋषि ने बप्पा रावल को पाला उनको शिक्षा दी और एक योग्य व्यक्ति बना दिया| अब धीरे-धीरे बप्पा रावल का भविष्य उनके पास आ रहा था| हुआ कुछ यूं कि हर रोज बप्पा रावल आश्रम की सभी गायों को घुमाने ले जाते थे| पर जब वापस लाते थे उस समय जो गाय सबसे ज्यादा दूध देती थी उसका दूध नहीं निकलता था| सब को लगा कि बप्पा रावल उस गाय का दूध पी जातेहैं| जब यह घटना रोज घटने लगी फिर एक दिन जब बप्पा रावल ने देखा की वो गाय कहीं जा रही है| तो वो खुद उस गाय के पीछे गये और उन्होंने देखा कि गाय एक  शिवलिंग के ऊपर अपना सारा दूध चढ़ा देती है| वहां पर ही एक हरित नाम के ऋषि  बैठे थे| बप्पा रावल ने उनसे पूछा कि यह कौन से देवता है? ऋषि वर तब उन्होंने बताया यह भगवान शिव की मूर्ति है| शिवजी के इस रूप का  नाम एकलिंग नाथ है| ऋषि ने बोला हे बालक तुम कोई साधारण बालक नहीं हो तुम आने वाले समय के एक प्रतापी राजा हो| तुम कल भोर में 5:00 बजे मेरे पास आना| यह सब बातें उन्होंने आश्रम पहुंचने के बाद अपने गुरु और माता को बता के पूछा कि हे गुरुवर मै कौन हूं? मेरा अस्तित्व क्या है? नारंग मुनि ने कहा “हे वत्स अब समय आ गया है कि तुम अपना अस्तित्व जान लो और सुनो तुम और कोई नहीं इक्ष्वाकु कुल शिरोमणि सूर्य वंशी महाराज भगवान श्री राम के वंशज महाप्रतापी मेवाड़ राज वंश के इकलौते वंशज हो | यह सुनने के बाद बप्पा रावल ने पूछा कि मेरे पिता कहाँ हैं? नारंग मुनि ने उन्हें बताया कि कैसे चित्रांगद गौरी ने बप्पा रावल के पिता की छल से हत्या कर दी थी| इतना सब बताने के बाद नारंग ऋषि ने कहा| अब तुम सो जाओ और तुम कल उन ऋषि के पास अवश्य जाना| इस पूरी घटना के बाद बप्पा रावल निद्रा-आवास में जाकर सो  गये| परंतु भोर में उनका उठने में थोड़ा विलंब हो गया| वह जैसे ही उठे वह सबसे पहले उन ऋषि के पास गए| ऋषि से उन्होंने माफी मांगी बोले हे ऋषिवर मुझे क्षमा करें मुझे आने में थोड़ी देर हो गयी| ऋषि बोले वत्स कोई बात नहीं, पर अब मैं जैसा बोलता हूं वैसे ही करो| तुम अभी जहां पर खड़े हो वहीं खड़े रहो| यह कहने के बाद ऋषि ने बप्पा रावल के ऊपर थूक दिया| बप्पा रावल के ऊपर जब उन्होंने थूका तो बप्पा रावल ने अपना पैर वापस पीछे की तरफ ले लिया और वह थूक उनके पैर पर गिरी| ऋषिवर ने बप्पा रावल से पूछा हे वत्स तुमने अपने पैर पीछे क्यों हटा लिया? बप्पा रावल में बोले माफ करें ऋषिवर मुझे लगा कि आप थूकने वाले हैं इसलिए मैंने अपने पैर पीछे हटा लिया| ऋषिवर बोले तुमने यह बहुत बड़ी गलती कर दी अगर यह थूक तुम्हारे सर पर पड़ती तो जब तक तुम्हारा वंश रहता वह समूचे हिंदुस्तान पर राज करता पर यह तो तुम्हारे पैर पर पड़ी है तो भी इसका असर खाली नहीं जाएगा | तुम जहां जहां भी पैर रखोगे वह राज्य तुम्हारे हो जाएंगे| यह कहने के बाद ऋषिवर चले गए|

अब बप्पा रावल ने अपने पिता के हत्यारे चित्रांगद गोरी से बदला लेने की ठानी और वह चित्तौड़गढ़ की तरफ बढ़ गए| उस समय चित्तौड़गढ़ का नाम चित्रकोट था| उन्होंने जैसे ही चित्तौड़गढ़ में अपने पांव रखें चित्तौड़ की सत्ता उनके हाथ में आनी चालू होगी| चित्रांगद गौरी को  उस समय एक प्रधानमंत्री की जरूरत थी| बप्पा रावल चित्रांगद गौरी के पास गए और कहा हे महाराज मैं आपका सेवक बनना चाहता हूं कृपया करके मुझे अपना प्रधानमंत्री नियुक्त करें| चित्रांगद गौरी ने कहा मैं ऐसे ही किसी राह चलते आदमी को प्रधानमंत्री नहीं बना सकता| मैं तुम्हारी कुछ परीक्षाएं लूंगा अगर तुम उस में सफल होते हो तो मैंतुम्हें अपना प्रधानमंत्री बना दूंगा| उसने सबसे पहले बप्पा रावल की दिमाग की परीक्षा ली जिसमें बप्पा रावल सफल रहे| इसके बाद उसने शस्त्र विद्या और शास्त्रों की परीक्षा ली उसमें भी बप्पा रावल सफल रहे|  इस से खुश होते चित्रांगद गौरी ने उन्हें अपना प्रधानमंत्री नियुक्त कर लिया और इसी से चित्रांगद गौरी की मृत्यु की उलटी गिनती चालू हो गयी| फिर क्या था, जैसे जैसे समय बीतता गया बप्पा रावल ने गोरी की समस्त सेना को अपनी तरफ मिला लियाऔर एक दिन एक गुप्त सभा का आयोजन किया| जिसके बारे में गोरी को कुछ भी नहीं पता था| उसमे उन्होंने गोरी के सब सेनापतिओं और मंत्रिओं को अपने तरफ मिला लिया| अगले दिन उन्होंने कहा “हे चित्रांगद गौरी मैं उसी रावल भट्ट सिंह का पुत्र हूं जिसे तुमने छल से मारव दिया था मैं तुमसे अपना मेवाड़ राज्य वापस लेने आए हो अगर अपनी ख़ैरियत चाहते हो तो चुपचाप यहां से चले जाओ वरना मेरे से युद्ध करो|” चित्रांगद गौरी ने सैनिकों को आदेश दिया पर उसे नहीं पता था कि सारे सैनिक बप्पा रावल की तरफ मिल चुके थे| इस दुस्साहस के चलते बप्पा रावल ने  चित्रांगद गौरी को कैद कर लिया और उसे मृत्युदंड सुना दिया| अब आप सब सोच रहे होंगे की बप्पा रावल ने मेवाड़ पुन: वापस हासिल कर लिया इसलिए उन्हें मेवाड़ राज का संस्थापक बोलते हैं| परन्तु ऐसा नहीं है उन्हें मेवाड़ राज वंश का संस्थापक इस लिए बोलते हैं क्योंकि चित्रांगद गोरी ने भारत वर्ष में यह खबर फेला दी थी की मेवाड़ राजवंश का अन्त हो चूका है और बप्पा रावल ने एके फिर से मेवाड़ राजवंश की स्थापना की इसलिए उन्हें मेवाड़ राजवंश का संस्थापक बोलते हैं|

बप्पा रावल ने राजपूताने को कई बार अरब के आक्रमणों से बचाया भी था| जिसमे सन 736 ई का युद्ध बहुत प्रसिद्द है|क्योंकि इस युद्ध में बप्पा रावल ने एक नई प्रकार की तकनीक का इस्तमाल किया था| उन्होंने एक एक ऐसे धनुष का निर्माण किया था जो एक बार में कम से कम 10 तीर छोड़सकता था| वर्तमान समय में इस धनुष को क्रॉसबो के नाम से जाना जाता है| अंग्रेज इतिहासकार और कुछ समय के लिए भारत के वाइसराय रहे चुके कर्नल जेम्स टॉड लिखते हैं कि "यह धनुष उस समय की बन्दुक था|" बप्पा रावल ने इस धनुष से सम्पूर्ण अरबी सेना में हाहाकार मचा दिया था| मज्बोरण महमूद शा इक्लेतुस को बप्पा रावल के सामने आत्म समर्पण करना पड़ा| बप्पा रावल ने राजपूताने की रक्षा के बाद भारत की सुरक्षा की तरफ और ध्यान दिया| उन्होंने वर्तमान पाकिस्तान से विदेशियों (खासकर अरबियों) को खदेड़ने के बाद सन 738 इसवी में एक शहर बसाया था इस जगह को वहां के स्थानियो लोग रावल पिंडी (बप्पा रावल के नाम पर) के नाम से बुलाने लगे| यह रावलपिंडी आज वर्तमान पाकिस्तान में स्थित है और वहां का एक प्रमुख शहर है | अरबियों ने इस हार का बदला लेने की ठानी और एक और बार भारत पे आक्रमण कर दिया| यह युद्ध पेशावर में लड़ा गया था| इसमें बप्पा रावल की सेना एक लाख से अधिक थी और अरबियों की 70000 थी| पर बप्पा रावल ने यह बात अरबियों को पता नहीं चल ने दी और अपनी सेना का बहुत बार हिस्सा वहां आस पास के जंगलों में छुपा दिया और मात्र 30000 की सेना के साथ वे अरबियों के सामने आये| यह उनकी चाल थी जिसमे अरबी फंस गए और वो अपनी सम्पूर्ण सेना के साथ बप्पा रावल के सामने आ गये| अब बप्पा रावल ने भी अपनी बाकी की सेना को बुला लिया और अरबियों की सेना को चारों तरफ से घेर लिया और उन्हें मारना चालू किया| इस युद्ध अरब के बहुत से सैनिक मर गए और 4000 अरबी सैनिक पकडे गए| जिसमे उनका राजा वजीरखां इक्लेतुस भी था| बप्पा रावल ने इन सब को मौत की सजा दी| वजीरखां इक्लेतुस  के मौत की खबर पुरे अरब में फैल गयी थी| सब अरब के वासी अब भारत आने से डर रहे थे| समूचे हिंदुस्तान के राजाओं ने बप्पा रावल के इस उपकार को स्वीकार और उन्होंने बप्पा रावल से आग्रह किया की आप हमारे राजा बन जाये और महा-चक्रवर्ती की उपाधि धारण करें| बप्पा रावल ने यह आग्रह स्वीकार किया और महा-चक्रवर्ती की उपाधि धारण की और समूचे भारत पे राज किया|

बप्पा रावल के डर से उनके मृत्यु के भी 300 साल बाद तक विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत में कदम नहीं रखा| बप्पा रावल ने सन 753 ई में समाधी ले ली और हमेशा का लिए सो गये| बप्पा रावल का राज काल 734 से 753 ई तक था| इनके राज्य में भारत की बहुत प्रगति हुई|

तो दोस्तों यह थी गाथा मेवाड़ राजवंश के संस्थापक और प्रथम मेवाड़ नरेश बप्पा रावल की|
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                 || जय राजपुताना ||
                   || जय भारत ||                       
धन्यवाद    
04\06\2018                                                       
     परम कुमार 
  कक्षा 9 
         कृष्णा पब्लिक स्कूल
                                                             

                                                               
                                                                      
                                                                
 ऊपर दी गयी फोटो इस लिंक से ली गयी है|                                                        
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