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Tuesday, 27 April 2021


नमस्कार दोस्तों, आप सबका आज की इस चर्चा में स्वागत है| आज की चर्चा में हम सब एक बार पुनः बात करने वाले हैं दसकंधार के बारे में, यानि महाबली, महातेजस्वी रावण के बारे में| आज से 2 साल पूर्व 6 मार्च 2019 को हम इस विषय पर चर्चा कर चुके हैं,परन्तु उस चर्चा में हमने रावण के बारे में वो सारी बातें जानी थीं जो हमे कठिनाई  से ही सही परन्तु उपलब्ध हो जाती हैं | परन्तु रावण के बारे में कुछ ऐसी भी बातें हैं जो मुझे लगता है कि आप सब को बतानी आवश्यक हैं और जो मैंने अपनी इन दो वर्षों की अनुसंधानिक प्रक्रिया में जानी हैं| आज की इस चर्चा सभा में हम उन्ही सब पहलुओं पर अपनी नज़र डालेंगे| चलिए तो आज की चर्चा शुरू करते हैं|

“राम नो जब लंका पर विजय पानी , तब नो सीता को अशोक वाटिका से मुक्त करनी

संसार तब राम न बाहुबल जाना, परन्तु सीता नो राम पवित्र पाना, वह ता रावण को तपोबल बलवाना”

ऊपर दिए गए इस दोहे का तात्पर्य है कि- भगवान श्री राम चन्द्र ने रावण पर विजय पाकर माता सीता को मुक्त किया यह उनका बाहुबल था,परन्तु माता सीता उनको पवित्र मिली यह रावण का तपोबल था| दोस्तों जब भी हम किसी व्यक्ति से मिलते हैं तब हम मात्र उसको देख कर या दुसरो से सुनी-सुनाई बातों के आधार पर उसके चरित्र का फैसला नहीं कर सकते| ऐसा ही कुछ व्यक्तित्व और चरित्र रावण का है | रावण का चरित्र अत्यंत प्रेरणा दायक है, मैं खुद रावण के चरित्र से अत्यंत प्रभावित हूँ और उसके चरित्र के सकारात्मक गुणों से काफी प्रेरणा पाता हूँ| अब आप सब सोच रहे होंगे की मैं यह कैसी बात कर रहा हूँ, कोई रावण से क्या प्रेरणा पा सकता है| तो दोस्तों हर व्यक्ति में दो चरित्र होते हैं नकारात्मक और सकारात्मक चरित्र| कुछ ऐसा ही रावण का भी व्यक्तित्व है | हम केवल रावण के नकारात्मक चरित्र को जानते है, परन्तु उसके सकारात्मक व्यक्तित्व और उसके जीवन के संघर्ष से भी कई अवगत नहीं है| मैं आज आप को कुछ ऐसी ही बातें बताऊंगा और रावण के इस धरती पर आने और धरती से जाने की तिथि भी बताऊंगा|

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तो आइये पहले जाने रावण की जन्म तिथि और उसके जन्म के बारे में| वैसे तो मैं ने इससे पूर्व के रावण के ब्लॉग में रावण के इस धरती पर अवतरित होने के बारे में बताया है परन्तु उसमे रावण के जन्मतिथि की कोई जानकारी नहीं थी| तो दोस्तों रावण का जन्म 4-6 तारीख को माघ महीने यानि फ़रवरी में 1194924 ई. पूर्व में यानि सत्य युग में हुआ था और मृत्यु वैशाख महीने में जब मंगल कौशल नक्षत्र में प्रवेश किया यानि नवम्बर या दिसम्बर की 4 तारीख को 5076 ई.पूर्व में हुई|


मित्रों आप में से बहुत से लोग सोचते होंगे की मैं रावण को इतना सम्मान देकर क्यों संबोधित करता हूँ| दोस्तों इसका कारण यह है की श्री राम से एक बार हनुमानजी ने पूछा था की “प्रभु आप जब भी किसी को रावण से हुए अपने संघर्ष के बारे में बताते हैं तो आप उसे महान, प्रखंड आदि उच्च-कोटि के संबोधनों से संबोधित क्यों करते हैं तब भगवान श्री राम ने कहा हर व्यक्ति में दो प्रवृत्तियाँ होती हैं सकारात्मक और नकारात्मक| परन्तु एक साधारण मनुष्य हमेशा एक व्यक्ति की नकारात्मक छवि पर ही ध्यान देता है ताकि वो अपने आप को उससे ज्यादा श्रेष्ठ सिद्ध कर सके| परन्तु ऐसा करते वक्त वो यह भूल जाता है कि उसमें (सामने वाले मनुष्य में) वो नकारात्मक प्रवृत्ति तो थी परन्तु उसमें (सामने वाले मनुष्य में) एक ऐसी सकारात्मक प्रवृत्ति भी थी जिसने  सामने वाले व्यक्ति को (दुसरे व्यक्ति को) विवश कर दिया की वो अपने अन्दर लोगों को नीचा दिखने की नकारात्मक प्रवृत्ति को जन्म दे| संसार आज राम की जय और रावण की हाय इसलिए कर रहा है क्योंकि उन्होंने केवल राम की सकारात्मक प्रवृत्ति देखी और रावण की केवल नकारात्मक प्रवृत्ति | संसार यह भूल गया राम तो एक राजा के पुत्र थे, जिसे अगर वनवास न हुआ होता या फिर सीता हरण न हुआ होता तो बिना किसी प्रयत्न या जतन के समग्र सप्तसिंधु का राज प्राप्त हो जाता| वन के संघर्ष के अलावा कोई संघर्ष नहीं करना पड़ता| परन्तु वो रावण था जिसे पहले उसकी माँ के असुर होने की वजह से गुरुकुल से निकला गया, वो वह रावण था जिसके पिता का नाम होते हुए भी वह उस नाम का उपयोग नहीं कर सकता था, वह रावण का ही संघर्ष था जिसने अपने जीवन में इतने बड़े कुल में जन्म लिया जहाँ उसके प्र्पितामः सृष्टि के रचियता ब्रह्मा थे, जिसके पितामह ऋषि पुलत्स्य और पिता ऋषि विश्र्वा थे इसके बावजूद संसार का तिरस्कार सहन करना पड़ा और अंत वह रावण अपने कर्म के बल से स्वर्ण नगरी का राजा बना और जब-जब भी मेरे परमप्रतापी पूर्वजों को अहंकार हुआ तब वही था जिसने उन्हें पराजित किया| वह रावण ही था जिसने कभी मेरे पूर्वज महाराज मान्धाता, मेरे पितामह महाराज अज और मेरे पिता महाराज दशरथ को युद्ध में पराजित किया था और यह सत्य है कि अगर रावण को इस जगत से इतना तिरस्कार न मिला होता तो आज और राम की जगह लाकेश्वर दशकंधार की जय जयकार होती| रावण का व्यक्तित्व एक व्यक्ति को उत्सह प्रदान कर सकता है कि किस प्रकार एक व्यक्ति मात्र अपने इच्छाशक्ति के बल पर सब कुछ हासिल कर सकता है| यही कारण है कि मैं रावण को महान, प्रखंड आदि उच्चकोटि के संबोधनों से संबोधित करता हूँ| यह हर मनुष्य के लिए बहुत अच्छा होगा अगर वह सामने वाले व्यक्ति की नकारात्मक प्रवृत्ति पर ध्यान न देकर केवल उसकी सकारात्मक प्रवृत्ति को अपनाये| हमे केवल  हर नकारात्मक परिस्थिति में सकारात्मकता देखनी चहिये यह एक साधारण मनुष्य के दिव्यता प्राप्त करने का महत्वपूर्ण चरण है”|

दोस्तों यही कारण है कि क्यों मैं रावण को इतना सम्मान देता हूँ, यदि हम किसी व्यक्ति की नकारात्मक प्रवृत्ति से हटकर उसकी सकारात्मक छवि पर ध्यान दें तो क्या पता  हमको कुछ ऐसा प्राप्त हो जो शायद हमने सोचा भी ना हो| आज की चर्चा सभा खत्म करने से पूर्व मैं आप लोगों को एक और अत्यंत महत्वपूर्ण जानकारी देना चाहूँगा, और वो यह है की, आप सब जानते होंगे की रावण कुम्भकर्ण और विभीषण ने ब्रम्हा  जी की पूजा की थी और उनसे वरदान प्राप्त किए थे| कुम्भकर्ण ने जब ब्रम्हा  जी से वरदान माँगा था तब उसकी जीभ पर माँ सरस्वती बैठ गयी थीं तब उसके मुख से इन्द्रासन की जगह निद्रासन निकल गया था| तब रावण ने विनती की थी कि आप अपना वरदान वापस लें तब ब्रम्हा जी ने कहा था “यह वरदान वापस तो नहीं हो सकता पर इसमें कुछ बदलाव अवश्य किये जा सकते हैं तुम्हारी इच्छा अनुसार तब रावण कुछ बोलता उसके पूर्व ही ब्रम्हा जी ने कह दिया ठीक है कुम्भकरण 6 महीने जागेगा और एक दिन उठेगा फिर 6 महीने सो जायेगा तब रावण ने कहा यह वरदान तो अपने दिया हमने नहीं माँगा हम इसे भी स्वीकार करते हैं परन्तु आप कुम्भकर्ण को वरदान दें  योगनिद्रासन प्राप्त हो आर्थात वो 6 महीने योगनिद्रासन में रहे फिर एक दिन उठ कर 6 महीने योगनिद्रासन में लीन हो जाये| तब ब्रम्हा जी ने कहा तथास्तु परन्तु याद रहे 6 महीने की अवधि के पहले अगर कुम्भकर्ण उठा तो उसकी मृत्यु हो जाएगी”| तो दोस्तों आखिर क्या करता था कुम्भकर्ण 6 महीने योगनिद्रा में? इस प्रश्न  आप को जवाब अगले ब्लॉग में मिलेगा| आप इतना जान लीजिये योगनिद्रा एक ऐसी अवस्था होती है जिसमे एक व्यक्ति अपने शरीर से निकल कर इस ब्रह्माण्ड में कहीं भी विचरण कर सकता है|

अगर आपको यह ब्लॉग आच्छा लगा तो इशे शेयर करें और लोगों को भी बताये रावण के इस महान व्यक्तित्व के विषय मैं| जल्द मिलेंगे अगले ब्लॉग में तब तक के लिए|

                          || जय महाकाल ||

Earning Website Link-  

https://www.ysense.com/?rb=101658828


27/4/2021

परम कुमार

कक्षा -12

कृष्णा पब्लिक स्कूल

रायपुर(छ.ग.)




ऊपर दी गयी समस्त जानकारी वाल्मीकि रामायण,काम्ब रामायण ,रावण सहितं, रघुविर्पुर्षम से ली गयी हैं|

रावण की तस्वीर इस लिंक से ली गयी है - t.ly/J0xB




Sunday, 4 October 2020

 

जय महाकाल,

नमस्कार दोस्तों, आप सबका एक बार पुनः मेरे ब्लॉग में स्वागत है| आज हमारी चर्चा का विषय भारत के किसी ऐसे वीर योद्धा पर नहीं है जिसके बारे में भारत के लोग अनभिज्ञ है| आज हमारी चर्चा

का विषय भारत के एक उस महावीर योद्धा पर है जिसकी ख्याति भारत में एक अलग ही कीर्तिमान स्तंभ के तौर पर प्रज्वलित है| जिसके नाम के ऊपर ब्रजभाषा का एक बहुत ही सुंदर ग्रंथ पृथ्वीराज रासो लिखा गया है| जी हां दोस्तों आपने बिल्कुल सही समझा| आज हमारी चर्चा का विषय पृथ्वीराज चौहान के ऊपर है| दोस्तों पर मैं पृथ्वीराज चौहान जैसे महावीर योद्धा के बारे में आपको ऐसा कुछ नहीं बताने वाला जो आपको मालूम ना हो| परंतु मैं आपको एक ऐसी सच्चाई बताने वाला हूं| जो की पृथ्वीराज चौहान के इतिहास से जुड़ी हुई है और जो शायद आपको ना मालूम हो| दोस्तों इतिहास में यह वर्णित है कि पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को शब्दभेदी बाण चलाकर मारा था| परंतु दोस्तों यह बात असत्य है मेरा मकसद पृथ्वीराज चौहान जैसे महावीर की ख्याति को यह बोलकर कि उन्होंने मोहम्मद गौरी को नहीं मारा था कहकर उनकी ख्याति कम करना नहीं है|



इसमें कोई शक नहीं कि पृथ्वीराज चौहान जैसे वीर बहुत कम ही हुए है| परंतु ऐसे महावीर के बारे में उसकी शान में झूठी बातें लिखकर हम उसकी इज्जत उसके सम्मान को ऊपर नहीं पहुंचाते और नीचे ले आते है| निःसंदेह पृथ्वीराज चौहान एक महावीर योद्धा थे  परंतु उनकी युवावस्था में बड़बोले मंत्रियों ने उन्हें अपने सर पर चढ़ा के रखा था| एक राज्य और उसके राजा की सफलता तभी होती है जब उसे उसके आसपास उसके निंदक मिले| परंतु पृथ्वीराज चौहान जैसे महावीर योद्धा की शायद यह बदकिस्मती थी| कि उन्हें कभी भी ऐसे विश्वसनीय मंत्री ना मिल सके| उनके एक मित्र जरूरत हुए चंद्रवरदाई जिन्होंने पृथ्वीराज रासो लिखी| परंतु दोस्तों इतिहास में सबसे बड़ा सवाल जो आता है वह यह की अगर चंद्रवरदाई और पृथ्वीराज चौहान गौर प्रदेश जो कि आज के तत्कालीन अफगानिस्तान में है, वहीं पर मोहम्मद गौरी को मारने के पश्चात मृत्यु को प्राप्त हो गए थे| तो चंद्रवरदाई के द्वारा लिखी गई किताब पृथ्वीराज रासो को किसने पूरा क्योंकि इतिहास में इस बात का जिक्र नहीं मिलता कि चंद्रवरदाई के साथ कोई और भी पृथ्वीराज चौहान की सहायता के लिए अफगानिस्तान गया था| चलिए हमने एक बार इस बात को भी मान लिया की चंद्रवरदाई के साथ कोई और भी गया था अफगानिस्तान और उसने वापस आके पृथ्वीराज रासो पूरी कर दी| परंतु इतिहास में यह लिखा हुआ है कि पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु सन 1192 ईस्वी में हो गई थी| और मोहम्मद गौरी की मृत्यु 1206 ईस्वी में| दोनों तारीखों में 14 साल का अंतराल है| जिससे यह साफ होता है की पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को नहीं मारा था| मैं एक बार पुनः इस बात का जिक्र कर रहा हूं कि मेरा इस बात को लिखना कि पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को नहीं मारा था उनकी इज्जत को कम करना नहीं बल्कि भारत को उसके वीर के बारे में सही इतिहास बताना है और ऐसा लिख कर एक महावीर योद्धा की ख्याति को भारत के इतिहासकार बढ़ा नहीं रहे बल्कि उसे और कम कर रहे हैं और यह सही बात नहीं है| दोस्तों पृथ्वीराज रासो में 18000 से भी ज्यादा पृष्ठ हैं परंतु सोचने वाली बात यह है की 16000 पृष्ठ ब्रज भाषा में लिखीं है और बाकी के 2000 पृष्ठ नई मेवाड़ी भाषा में लिखे हुए है| इससे यह साफ होता है कि वह पृष्ठ जिसमें लिखा गया है की चंद्रवरदाई ने यह दोहा बोलाचार बांस चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमाण ता ऊपर पर बैठा सुल्तान ना चुके चौहान और पृथ्वीराज चौहान ने इसको सुनके मोहम्मद गौरी को मार दिया इसको बहुत बाद में लिखा गया है|

अतः इन सब प्रमाणों से यह सिद्ध होता है पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को नहीं मारा था| परंतु दोस्तों इसका मतलब यह नहीं कि पृथ्वीराज चौहान वीर नहीं थे| मैं आज भी डंके की चोट पर यह लिखता हूं कि पृथ्वीराज चौहान ने जिस अल्पायु में एक गैर भारतीय शासक को 16 बार युद्ध में हरा दिया(यह 16 युद्धों में से पृथ्वीराज चौहान ने 15 युद्ध मौहम्मद गोरी के सेनापति और मंत्रियों से लड़ा था मात्र 16 और 17 वां युद्ध मौहम्मद गोरी ने स्वयम पृथ्वीराज से लड़ा 16 वें युद्ध में हार के बाद 17 वें युद्ध में मौहम्मद गोरी को पृथ्वीराज पे जीत हासिल हुई थी) उस अल्पायु में भारत का कोई भी योद्धा वह काम ना कर सकता था| परंतु किसी भी वीर की ख्याति को बढ़ाने के लिए उसके बारे में झूठी तारीफे लिखना ना केवल भारतीय इतिहास के लिए हानिकारक है बल्कि स्वर्ग में बैठे उस वीर की आत्मा को भी इससे पीड़ा होती है| सबसे महत्वपूर्ण बात जो मैं आप सब को बताना चाहूंगा वह यह की गद्दारों की सूची में एक नाम आता है जयचंद| कहा जाता है की जयचंद ने मोहम्मद गौरी का साथ दिया,इसकी वजह से पृथ्वीराज चौहान हार गए परंतु दोस्तों यह असत्य है| जयचंद ने कभी भी मोहम्मद गौरी का साथ नहीं दिया था और ना ही जयचंद कभी भी पृथ्वीराज चौहान और अपनी पुत्री संयोगिता के विवाह से असंतुस्थ नहीं थे| आपको जानकर यह बड़ी हैरानी होगी परंतु जो जयचंद थे वह पृथ्वीराज चौहान के पिता के मित्र थे परंतु यह बहुत दुर्भाग्य की बात है कि हमारे इतिहास से इतने ज्यादा फेरबदल हुए कि हमने जो वीर थे उन्हें गद्दार घोषित कर दिए और जो गद्दार थे उन्हें हमने वीर बना दिया|

अगले ब्लॉग में मैं आप लोगों को बताऊंगा क्यों जयचंद को गद्दार घोषित कर दिया गया भारतीय इतिहास में| अंत में मेरा आप सब से बस यही निवेदन है कि आप इस ब्लॉग को अधिक से अधिक शेयर करें ताकि लोगों को भारत के वीरों की असली बातें पता चल सके और उन्हें पृथ्वीराज चौहान जैसे महावीर का असली इतिहास मालूम हो|

4/10/2020

परम कुमार

कक्षा-11

कृष्णा पब्लिक स्कूल

रायपुर(छ.ग.)



 अगर आप सुविचार पढ़ना चाहते हैं तो नीचे दी गई लिंक को दबाएंl

https://madhurvichaar.blogspot.com/2020/09/blog-post.html


 ऊपर दी गयी तस्वीर इस लिंक से ली गयी है-https://in.pinterest.com/pin/520728775637428966/



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