Sunday, 7 June 2020

जय महाकाल
नमस्कार दोस्तों !!!
 आप सब का एक बार फिर से मेरे ब्लॉग में स्वागत है| आज की हमारा चर्चा का विषय भारत के एक ऐसे महान योद्धा पर है जिसने समस्त भारतवर्ष पर अधिकार करने वाली ताकत तुगलक शाही को हराकर भी पूरे भारत पर अपना अधिकार नहीं जताया और सभी राज्यों को उनका राज्य वापस दे दिया| इस योद्धा ने पूरे भारत में भारत के वीरों का जोर-शोर फिर से बढ़ा दिया| अलाउद्दीन खिलजी और मोहम्मद गयासुद्दिन तुगलक जैसे वीरों को हराकर और उनके अत्याचारों का नामोनिशान मिटा कर विदेशी आक्रमणकारियों के अंदर अपना डर बैठाया और भारत की कीर्ति को एक नवीन स्थान पर पहुंचाया।
आप सोच रहे होंगे की भारत में तो ऐसे बहुत वीर हुए पर आपको कुछ ना कुछ तो यह समझ में आया ही होगा कि मैं जिन वीरों की बात कर रहा हूं वह अलाउद्दीन खिलजी से लेकर मोहम्मद गयासुद्दिन तुगलक के बीच के समय में रहे| अब आपके दिमाग में इस समय के भी वीरों के नाम आए होंगे परंतु आप  समझ नही पा रहे होंगे कि मैं किसकी बात कर रहा हूं| तो चलिए आपकी परेशानी को हल करते हुए मैं आपको बताता हूं मैं किस वीर की बात कर रहा हूं|
यूं तो भारत में बहुत से वीर हुए किसी को सम्राट बोला गया किसी को महाराज बोला गया किसी को राजा बोला गया किसी को शहंशाह तो किसी को बादशाह बोला गया| उपाधि जो भारत के वीरों में हमेशा याद रहती है वह उपाधि है महाराणा| अब आप लोगों के दिमाग में बहुत से नाम गए होंगे जैसे कि महाराणा प्रताप, महाराणा सांगा, महाराणा कुंभा, और इसी महान सूर्यवंश के कई वीर योद्धाओं के नाम आए होंगे| परंतु दोस्तों मैं आज आपको जिस वीर के बारे में बताने जा रहा हूं उसी को सबसे पहले महाराणा का खिताब मिला था, जो रावल से महाराणा बना और  चित्तौड़ में रावल से महाराणा बना और जिसने अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ को नष्ट करने के बाद चित्तौड़ में राजपूती झंडा पुनः लहरा कर पूरे भारत को बता दिया कि हिंदुस्तान हमेशा से वीरों की भूमि ही है और यहां पर वीरों की कमी कभी नहीं होगी|
 जी हां दोस्तों आप बिल्कुल सही समझे मैं बात कर रहा हूं चित्तौड़ और मेवाड़ कुल शिरोमणि वीर महाराणा हमीर सिंह की| आज के ब्लॉ में हम लोग जानेंगे कि किस प्रकार एक परिवार जो वर्षों से रावल का खिताब लगाता था वह किस प्रकार से महाराणा के ख़िताब  से नवाजा गया| आज मैं एक ओर हमीर सिंह के बारे में भी इस ब्लॉग में बताऊंगा बल्कि मैं कहूंगा कि मैं पहले आपको उसी हमीर सिंह के बारे में बताऊंगा जिसके बारे में इतिहास में यह लिखा जाता है कि वह अलाउद्दीन खिलजी के साथ वीरता पूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे|
 तो आइए दोस्तों नया ब्लॉग शुरू करते हैं
भारतीय इतिहास में दो हमीरसिंह हुए
 एक थे मेवाड़ नरेश महाराणा हमीर सिंह| और दूसरे थे रणथंबोर के राजा राव हमीर सिंह| इन दोनों में केवल इतना ही संबंध था कि राव हमीर सिंह रावल रतन सिंह के कार्यकाल में रणथंबोर के राजा थे| आइए जानते हैं किस प्रकार से हमीर सिंह और अलाउद्दीन खिलजी के बीच युद्ध हुआ|
28 दिसंबर सन 1302 मैं अलाउद्दीन खिलजी ने दूसरी बार चित्तौड़ को जीतने का निर्णय लिया| इस घटना से प्रभावित होकर अलाउद्दीन खिलजी के एक सेनापति ने उससे कहा कि महाराज आप जैसे राजा को एक स्त्री के मोह में आके मेवाड़ जैसे प्रबल शत्रु के ऊपर आक्रमण करना शोभा नहीं देता| अपने सेनापति रजक खान की इस सलाह को अलाउद्दीन खिलजी ने अपना विरोध समझा और उसने उसके मौत का फरमान जारी करवा दिया| अगर उस समय हिंदुस्तान में या भारतवर्ष में कोई शक्ति थी जो उसकी प्राणों की रक्षा कर सकती थी तो वह थे मेवाड़ के नरेश रावल रतन सिंह| रावल रतन सिंह इस समय लगभग- लगभग 3600000 स्क्वायर किलोमीटर के भारत के क्षेत्रफल के राजा थे| इनके शासन में दिल्ली भी ती थी| जबकि बहुत सारी जगह से हमें यह मालूम होता है कि दिल्ली उस समय अलाउद्दीन के कब्जे में था| दोस्तों जॉन डायर की किताब के अनुसार अलाउद्दीन खिलजी का राज दिल्ली पर रावल रतन सिंह की मृत्यु के बाद स्थापित हुआ था और इस समय तक वह अपना राज दिल्ली के पास के एक किले जिसको देवगिरी भी कहा जाता है वहाँ से करता था|
चित्तौड़ की तरफ बढ़ते हुए रजक खान के रास्ते में रणथंबोर पड़ा| जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है रणथंबोर के राजा राव हमीर सिंह थे जोकि मेवाड़ के रावल रतन सिंह के मंत्री भी थे| रज खान ने अपनी सारी व्यथा राव हमीर सिंह को बताई और उन्हें आगाह किया कि जल्दी ही अलाउद्दीन मेवाड़ पर आक्रमण करेगा और रजत खान ने अपने प्राणों की रक्षा हेतु राव हमीर सिंह जी से सहायता मांगी| राव हमीर सिंह ने उन्हें यह बोलते हुए कि राजपूत जब दोस्ती करते हैं तो सर कटवा देते हैं और दुश्मनी करते हैं तो सर काट देते हैं  उन्हें वचन दिया कि तुम्हारी रक्षा हम अवश्य करेंगे| पर शायद यह नियति को मंजूर ना था| रावल रतन सिंह के राज्य की सीमा में तत्कालीन अफगानिस्तान और पाकिस्तान भी आते थे| अफगानिस्तान के सरदार मोहम्मद उल्लाह खान ने अलाउद्दीन खिलजी के भड़काने पर विद्रोह कर दिया था इस विद्रोह को दबाने के लिए रावल रतन सिंह को अपनी सेना का एक बहुत बड़ा हिस्सा अफगानिस्तान की और भेजना पड़ा था जिसकी वजह से चित्तौड़ में केवल 25000 की सेना थी| पर यह तो बा की बात है| सबसे पहले अलाउद्दीन खिलजी के सामने जो चुनौती थी वह थी रणथंबोर का किला जिसकी रक्षा राव हमीर सिंह कर रहे थे| राव हमीर सिंह के पास अलाउद्दीन खिलजी का यह संदेश भेजा गया कि अगर आप रावल रतन सिंह के विरोधी मोहम्मद अलाउद्दीन खिलजी की सहायता करेंगे तो आपको मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनाया जाएगा| राव हमीर सिंह ने इस को अस्वीकार करते हुए वही बात दोहराई जो उन्होंने रज खान को सहायता के वचन देते समय दोहराई थी कि हम राजपूत जब दोस्ती करते हैं तो सर कटवा देते हैं और दुश्मनी करते हैं तो सर काट देते हैं”| इसका मतलब साफ था कि भयंकर युद्ध होने वाला था| 6 जनवरी 1303 को रणथंबोर का भयानक युद्ध हुआ  इस युद्ध में कोई भी जीवित रह का| राव हमीर सिंह भी अपने वचन की खातिर जक खान की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए|  इतिहास में वर्णित मिलता है कि केवल 4000 राजपूत योद्धाओं ने  70000 की  मुसलमानी सेना का सामना किया और उन्होंने  20000  विदेशियों को मार गिराया| इस युद्ध में बड़ी मुश्किल से रजक खान बच पाया और वह भागता हुआ चित्तौड़ पहुंचा और उसने उसने रावल रतन सिंह को यह संदेश सुनाया कि चित्तौड़ पर अलाउद्दीन का आक्रमण होने वाला है| अगर आप सब ने मेरा पद्मावत वाला ब्लॉक पड़ा है तो आपको मालूम ही होगा कि इस युद्ध में रावल रतन सिंह की हार हुई थी और इनके साथ इनके छह भाई वीरगति को प्राप्त हुए थे और हिंदुस्तान पर खिलजी ओं का शासन कायम हुआ था|
मेवाड़ भी अब स्वतंत्र राज्य ना रहा था| मेवाड़ का राज्य अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा के राजा जीजा को सौंप दिया था और उसको यह लगता था कि मेवाड़ का राजवंश समाप्त हो गया क्योंकि रावल रतन सिंह की कोई संतान नहीं थी पर यही उसकी गलतफहमी थी रावल रतन सिंह के बड़े भाई रावल हरि सिंह ज्योति चित्तौड़ के पास एक गांव सिरसोद के राजा थे| उनके यहां उनकी पत्नी उर्मिला से उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी पर दुर्भाग्य से उनकी माता और पिता दोनों ने ही चित्तौड़ में अपने प्राण गवा दिए थे| इसी वीर बालक का नाम था हमीर सिंह| यह वीर बालक आगे जाके तुगलक ओं से अपने मेवाड़ को पुनः मुक्त कराया  और मेवाड़ में पुनः गहलोत वंश की शाखा की नीव रखी| यह शिशोद गांव के थे इसलिए यह लोग अपने आप को शिशोदिया भी कहते थे|
https://www.paramkumar.in/
महाराणा हमीर सिंह के जन्म को लेके बहुत से किस्से कहनियाँ हैं| इनका जन्म चित्तोड़ के युद्ध के 6 महीने पहले हुआ हे| इनके पिता का रावल अरी सिंह था और माता का उर्मिला| परन्तु इन्हें दोनों का ही सुख ने मिल सका| पिता ने रावल रतन सिंह के साथ युद्ध में चित्तोड़ की रक्षा करते हुए प्राण दे दिए और माता ने महारानी पद्मिनी के साथ जौहर कर लिया| इस बच्चे का लालन पोषण इसके नाना हुकुम देव ने किया| बचपन से ही हमीर सिंह को उनके बलिदानी और वीर परिवार की गाथा सुनाई गयीं| कई जगह हमे लिखा मिलता हे की इनका जन्म सन 1314 ई. में हुआ था परन्तु यह तिथि गलत है क्यों की इस समय इनका जन्म नहीं बल्कि राज्य अभिषेक हुआ था| महाराणा हमीर सिंह ने मात्र 11 साल की अबोध आयु में मेवाड़ का एक बड़ा हिस्सा राजा जीजा से जीत लिया था पर अभी भी उनके सामने एक मुसीबत थी| चित्तोड़ जो की अभी भी उनके पास नहीं आया था| खिलजी भी इस बात से प्रभावित था पर वो अभी एक और युद्ध की स्थिति में नहीं था क्योंकि दक्षिण में कई हिन्दू राजाओं ने उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया था| इस लिए उस ने मेवाड़ के ऊपर ध्यान नहीं दिया| यही उसकी सब बड़ी गलती थी| चित्तोड़ का किला उस समय उसके दत्तक पुत्र शिहाबुद्दीन ओमार के पास था|जो की एक भगोड़ा वीर था| और सन 1315 ई. में वो पल आया जब हमीर सिंह ने चित्तोड़ के ऊपर चढ़ई का निर्णय लिया | वो यह जानते थे की चित्तोड़े के किले के ऊपर आक्रमण से उनके सैनिकों को बहुत क्षति होगी|
 इसलिए उन्होंने छापामार युद्ध का निर्णय लिया| 4 मार्च 1315 ई. को शिहाबुद्दीन ओमार शिकार पे गया था बस इसी मौके की तलाश में हमीर सिंह और उनके सैनिक थे| उन्होंने शिहाबुद्दीन ओमार को पकड़ लिया और उसकी प्राण की रक्षा के बदले में चित्तोड़ का किला माँगा| जिससे उन्हें बिना युद्ध के ही विजय मिल गयी| पर इससे भी वो संतुष्ट नहीं थे उन्होंने खिलजी से उसके पुत्र की रक्षा हेतु 5 करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ और 1000 हांथी मांगे जो की उसे देनी ही पड़ी| इसके पश्चात उसे तीन महीने जेल में रखकर हमीर सिंह ने उसे मुक्त कर दिया| अब यहाँ से शुरू होता हे भारत का एक और नया अध्याय| सन 1316 ई. के शुरुआत में खिलजी की भी मृत्यु हो गयी थी| उसके बेटे उतने लायक नहीं थे की पिता के साम्राज्य को संभल सकें| परन्तु मेवाड़ की भी समस्या कम नहीं थी| मेवाड़ को छोडके अधिकांश राजपूताने और भारत पर अभी भी खिलजी हुकूमत थी| उन्होंने इसके विरुद्ध एक युद्ध शुरू किया जो की चार साल तक चला जिसमे इन्होने बड़े-बड़े और महतवपूर्ण भारत के हस्से खिलजी वंश से जीत लिए| जीते गये प्रदेश कुछ इस प्रकार हें-
1.       राजपुताना( राजस्थान)
2.       अफगानिस्तान
3.       पाकिस्तान
4.       कश्मीर
5.       हिमाचल
6.       गुजरात
7.       मालवा
इतने प्रदेश जीतने के बाद इनके एक मंत्री ने सलाह दी “बाकि प्रदेशों को एक एक करके जीतने की बजाये अगर हम सीधे दिल्ली के ऊपर चढ़ई करें तो हमे पूरा भारत मिल जायेगा| हमीर सिंह को यह प्रस्ताव अच्छा लगा| उन्होंने एक युद्ध की तैयारी शुरू कर दी| उधर दिल्ली में भी खिलजी वंश समाप्त हो गया था और गयासुद्दिन तुगलक नया दिल्ली सम्राट था| और इस प्रकार सन 1322ई. में दिल्ली के सामने एक युद्ध हमीर सिंह के रूप में खड़ा था| गयासुद्दिन तुगलक हमीर सिंह की वीरता से परिचित नहीं था| उसने उनका उपहास बनाया पर उसे पता नहीं था यह 18-19 सल का लड़का वीरता में किसी शेर से कम ना था| युद्ध शुरू होने के पहले गयासुद्दिन तुगलक ने कहा बालक लौट जा में तुझे प्राण दान दे दूंगा| हमीर सिंह ने कहा जब राजपूत युद्ध पर जाता हे तो या तो अपना सर कटवा के वापस जाता हे यह फिर दुश्मन का सर काट के| एक और भीषण युद्ध हुआ जिसमे हम्मीर सिंह ने अपनी सूझ बुझ से मात्र 1 घंटे में अपने तीरंदाज सिपाहियों की मदद से गयासुद्दिन तुगलक को उसके हांथी से गिरवा दिया और गयासुद्दिन तुगलक को बंदी बना लिया|
अब हम्मीर सिंह का राज्य उत्तर में कश्मीर से दक्षिण में कत्तक तक, पश्चिम में अफगानिस्तान से पूर्व में अवनति तक था| परन्तु इन्हें इस राज्य का कोई मोह न था| उन्होंने यह सारे राज्य उनके असली राजाओं को वापस सोंप दिए| सन 1322 ई. से 1364 ई. तक बिना कोई युद्ध किए कुशल राज्य किया और अपने राज्य की प्रगति में धयान दिया| इसी बीच सन 1325 ई. में भारत के कई राजाओं ने इनसे विनती की की वो लोग इन्हें एक नए सम्मान से नवाजना चाहते हें और वो सम्मान था एक नई उपाधि महाराणा की जिसका अर्थ होता हे रण( युद्ध भूमि) का महाराज और इस प्रकार से हमीर सिंह बने मेवाड़ के पहले महाराणा और कहलाये महाराणा हम्मीर सिंह|
इस समय कई लोग कहेंगे कि गयासुद्दिन तुगलक या किसी और तुगलक का भारत पे राज था| तो यह इन विदेशी आक्रान्ताओं की पुरानी रित रही है कि वो अपनी हार को भी अपनी जीत बता देते है| जॉन दायर ने भी अपनी किताब लिखा है कि तुगलकों ने कभी भी राजपूताने और विजयनगर के ऊपर आक्रमण नहीं किया क्योंकि यहाँ पे उनकी हार हुई थी|
पर मुझे बड़ा तरस आता हे मेरे महान देश के इन अनसुने महान वीरों के ऊपर जिन्होंने भारत की प्रगति के लिए अपना जीवन कुर्बान कर दिया और आज उसी देश के लोग उन्हें भूल गये| भारत में एक ओर खिलजी और तुगलकों जैसे विदेशियों के ऊपर खिलजी मार्ग और तुगलकाबाद जैसी जगहों  के नाम हैं वहीं भारत के अनगिनत वीर राजाओं और योद्धाओं को लोग जानते तक नहीं| इनके बारे में पढ़ाया भी नहीं जाता है| अतः मेरी आप सब से इतनी ही विनती है कि इस ब्लॉग को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि लोग इन अनसुने वीरों के बारे में भी जान सकें|

07\06\2020
                                                          परम कुमार
                                                        कृष्णा पब्लिक स्कूल
                                                          रायपुर (छ.ग.)

ऊपर दी गयी इमेज इस लिंक से ली गयी हे-
https://www.google.com/url?sa=i&url=https%3A%2F%2Fjivanihindi.com%2Frana-hammir-ki-jivani%2F&psig=AOvVaw3K2knooXXtddlKHif9My-n&ust=1591608849925000&source=images&cd=vfe&ved=0CAIQjRxqFwoTCLjehZaz7-kCFQAAAAAdAAAAABAE


10 comments:

  1. Nice and motivational story.
    Please motivate and review my child alsonas he writes fictional story.

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  2. महाराणा हमीर सिंह जैसे अनेकोंक वीरों के कारण आज हम खुली हवा में चैन की सांस ले पा रहे है।हमारा इतिहास भी अंग्रेजों के द्वारा त्रुटिपूर्ण लिखा गया।परम ऐसे कुछेक देशभक्तों के शोध से हमें ऐसे अनसुने वीरों के बारे में पता चलता है।परम ऐसे देशभक्त गैरपेशेवर इतिहासकारों को उचित सम्मान मिलना चाहिए।

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  3. It's enlightening as ever. I can't thank you enough for having taken this noble initiative to bring forth the hidden glory of our illustrious past!

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  4. बहुत अच्छे। बहुत अच्छी जानकारी दी।

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  5. बहुत अच्छी जानकारी दी

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  6. वाह, आपकी लेखन शैली अदभुत है। साक्षात चित्रण। ऐसा लगता है आंखो के सामने इतिहास दोहराया जा रहा है।
    सुन्दर।

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  7. Increase my interest in history after read this

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  8. Very interesting I love Indian history you presented very well keep sharing like this...

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