जय महाकाल,
नमस्कार दोस्तों
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आप सब का हमारी आज की चर्चा में स्वागत है| आज
हमारी चर्चा का विषय ना ही किसी राजा पर है, ना ही किसी युद्ध पर है| हम आज भारत में व्याप्त जाती व्यवस्थापर है| हम आज एक ऐसे राजा के बारे में भी जानेगें जिनकी वीरता
का वर्णन पूरे भारतीय इतिहास में कहीं भी नहीं है| परन्तु उनकी वीरता को उस समय के
सभी वीरों ने प्रणाम किया था| उस वीर के बारे में जान लेने के पूर्व मैं भारत के
जाती श्रेणी के बारे में आप सब को एक नई जानकारी प्रदान करना चाहूँगा| आईये शुरू
करते हैं|
दोस्तों आज मैं
आप को जिस राजा के बारे में बताऊंगा, उनका उपनाम सुनके आप सब को बड़ी हैरानी होगी,
क्योंकि उनका उपनाम था “श्रीवास्तव” | जी हाँ दोस्तों आप सब ने ठीक पढ़ा “श्रीवास्तव|
आप लोग सोच रहे होंगे की मे यह क्या लिख रहा हूँ श्रीवास्तव राजा कैसे हो सकते हैं
वो तो क्यास्थ होते हैं जो कि भारत में व्याप्त जाती व्यवस्था के अनुसार वैश्य
श्रेणी में आते हैं| परन्तु दोस्तों यह असत्य है| क्यास्था वैश्य श्रेणी में नहीं
बल्कि क्षत्रिय श्रेणी में आते हैं| दोस्तों अब आप सब सोचेंगे की क्षत्रिय तो
राजपूत होते हैं कायस्थ क्षत्रिय कैसे हो सकते हैं| तो दोस्तों मै आपको बताना चाहूँगा
की दो साल की अनुसंधानिक प्रक्रिया के पश्चात् मुझे यह ज्ञात हुआ की “ कायस्थ
क्षत्रिय हैं परन्तु राजपूत नहीं ”| जब मै आज के ब्लॉग की अनुसंधानिक प्रक्रिया
में था तब मेरे मस्तिस्क में एक प्रशन कौंधा (यह प्रशन इस वजह से कौंधा क्योंकि
में भी कायस्थ हूँ)| भाई दूज के दिन हमारे यहाँ भगवान चित्रगुप्त की पूजा होती है,
जिसमे बताया जाता है की भगवान ब्रह्मा से भगवान श्री चित्रगुप्त का जन्म हुआ जो की
मस्तिस्क से ब्राहमण, बाहू से क्षत्रिय, कमर से वेश्य और घुटनों से शूद्र थे और
उनसे 12 पुत्रों की उतपत्ति हुई| मेरे मस्तिष्क में जो प्रश्न आया वो यह की भगवान
चित्रगुप्त की कथा के अनुसार कायस्थ किस वर्ण में आयेंगे? क्योंकि कथा में तो
कायस्थों में चारों वर्णों के गुणों का जिक्र है| इसके बाद जब मै इसकी अनुसंधानिक
प्रक्रिया में लगा तो मुझे ज्ञात हुआ की पूड़े भारत में मात्र क्यास्थ ही एक एसे
क्षत्रिय होते हैं जिनमे क्षत्रिय के गुणों के अलावा भारत में व्याप्त हर जाती के
गुणों का श्रेणी होता है और उस समय के भारत में मात्र क्यास्थ ही एसे लोग थे जो
किसी भी प्रकार का कोई भी मनोवांछित कार्य कर सकते थे| अतः यह हम लोग के लिए बहुत
महतवपूर्ण जानकारी है ताकि लोगों को भारत में व्यापत जाति व्यवस्था की उचित
जानकारी मिल सके क्योंकि हमें सही जानकारी की बहुत आवश्यकता है| मेरा मकसद यह नहीं
की में क्यास्थों की श्रेणी में अपनी ओर से कोई फेरबदल करूँ| मै बस आप लोगों को एक
उपयुक्त जानकारी दे रहा हूँ|
येह तो बात हुई
कायस्थों की उत्प्पति की| आईये अब बात करें एक ऐसे वीर की जिसने अपने समय के सब से
पराक्रमी और 16 वी सदी की भारत की सब से बड़ी ताकत यानि मुग़लों को चुनोती दी थी|
दोस्तों मै बात कर रह हूँ जशोर नरेश महाराज प्रतापदित्य श्रीवास्तव की| आज के समय
में जशोर बांग्लादेश में आता है| आईये तो जाने किस प्रकार महाराज प्रतापदित्य
श्रीवास्तव ने मुग़लों को चुनौती दी और बता दिया की एक व्यक्ति में क्या कुछ करने
की क्षमता है| दोस्तों यह घटना कुछ इस प्रकार की है| एक बार अकबर के दरबार में सन
1561 ई. में एक कवि आया था, जिससे अकबर ने अहंकारवश यह पुछा की भारत का सबसे
शक्तिशाली राजा कौन| है उस कवि ने कहा महाराणा प्रताप| यह सुन के अकबर ने अहंकारवश
अपने वैभव और ताकत का बखान कर दिया| तब उस कवि ने कहा आपने ने जो बातें बतायीं
जैसे कि मेरे पास 10 लाख की फौज है,1500 करोड़ से भी अधिक धन है, आदि| यह बातें साफ
करती हैं की इतना सब होने के बावजूद उस प्रताप को युद्ध में पराजित न कर सके| इससे
तो यही पता चलता है की महाराणा प्रताप आप से बड़े शासक हैं और एक सच्चे राजपूत और
मातृभूमि के भक्त हैं| तब अकबर ने कहा तुम राजपूतों की बात करते हो इतने सारे
राजपूत मेरे दरबार में भरे पड़े हैं| तब उस कवि ने कहा
“हर भारतीय राजपुताना का नही होता,
हर राजपुताना का व्यक्ति मेवाड़ी नहीं होता,
हर मेवाड़ी राजपूत नहीं होता,
हर राजपूत सूर्यवंशी नहीं होता,
और हर सूर्यवंशी राजपूत महाराणा प्रताप नहीं होता”|
इन पक्तियों को कहने
के बाद उस कवि का क्या हुआ हमें इसकी जानकारी नहीं मिलती इसके लिए हमे क्षमा करें|
परन्तु इतिहास
में वर्णित है की इस घटना के पश्चात् अकबर ने हल्दीघाटी के युद्ध की घोषणा करवादी
थी और यह भी कहा था,जो भी महाराणा प्रताप का साथ देगा वह मुगलों का पहला निशाना होगा|
इस युद्ध के समय महाराणा प्रताप से प्रेरित होकर जशोर के सबसे बड़े जमींदार ठाकुर
प्रतापदित्य श्रीवास्तव ने मुग़लों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था और बंगाल के नवाब
जो की मुगलों का सूबेदार था उसकी हत्या भी करवादी थी| इतिहास में इस घटना की कोई
उपयुक्त तिथि नहीं मिलती परन्तु कई इतिहासकारों के अनुसार यह घटना 1570 ई. से 1575
ई. के मध्य की ही है| इन्टरनेट पे महाराज प्रतापदित्य श्रीवास्तव की जन्म तिथि
1561ई. है और मृत्यु की तिथि 1611 ई. दी हुई है| इन दोनों तिथियों की कोई उपयुक्त
पुष्टि नहीं मिलती, परन्तु अधिकतर इतिहासकार मानते हैं की महाराज प्रतापदित्य
श्रीवास्तव का जन्म 1550 ई. से 1555 ई. के मध्य में ही हुआ है और मृत्यु 1608ई. से
1611ई. के मध्य हुई थी| बंगाल के नवाब की हत्या के पश्चात् ठाकुर प्रतापदित्य
श्रीवास्तव को बंगाल के लोगों ने महराज की उपाधि दे दी थी| अकबर के लिए यह बहुत
बड़ी चिंता का विषय बन गया था| क्योंकि उसके दो सब से महत्वपूर्ण धन आगमन मार्गों
में उसके शत्रुओं की राज्य की स्थापना हो गयी थी| उत्तर-पश्चिम में गुजरात के
मार्ग पर महाराणा प्रताप का शासन था| तो वही बंगाल के मार्ग पर नहीं बल्कि पूरे
बंगाल और बंगाल की खाड़ी पर महाराज प्रतापदित्य श्रीवास्तव का राज था| लगातार
महाराणा प्रताप से युद्धों में मुगलों को वैसे ही बहुत धन की हानि हुई थी| वो अपना
एक और धन का मार्ग नहीं खो सकते थे| इसके लिए अकबर ने स्वयम बंगाल पर पुनः अधिकार
करने के लिए अपने नेतृत्व में सन 1575 ई. में बंगाल गया| जहाँ पर उसके सामने एक
20-25 साल का एक बालक खड़ा था| तब अकबर ने कहा “बच्चे तुम चले जाओ तुम्हारे परिवार
को तुम्हारी आवश्यकता आने वाले समय में होगी| तुम एक व्यापारी हो व्यापारी ही रहो
राजा बनने की कोशिश मत करो तब महाराज प्रतापदित्य श्रीवास्तव ने कहा “मै राजा बनने
की कोशिश नहीं कर रहा, मै राजा बन चुका हूँ”| यह सुन के अकबर ने युद्ध का आदेश दे
दिया परन्तु यह युद्ध अकबर के पक्ष में न था बंगाल में इस समय वर्षा आयी हुई थी जिसकी
वजह से अकबर के सेनिकों के हांथियों के पांव जमीन में धंसने लगे और बिजली कडकने की
वजह से हांथियों में भगदर मच गायी और अकबर की सेना को बहुत हानि हुई| स्वयम अकबर
का हांथी खुद हवाई भी इस युद्ध में बेकाबू हो गया था| इस मौके का फायदा उठा के
महाराज प्रतापदित्य श्रीवास्तव की सेना ने अकबर की सेना पे जबरदस्त आक्रमण किया और
क्योंकि उनकी सेना में पैदल सैनिकों की संख्या अधिक थी महाराज प्रतापदित्य
श्रीवास्तव की सेना मुगलों पर भारी पड़ी| इस युद्ध में महाराज प्रतापदित्य
श्रीवास्तव की विजय हुई और अकबर को युद्ध से भागना पड़ा| कहा जाता है की एक बार जब
महाराज प्रतापदित्य श्रीवास्तव बनारास अपने मित्र के यहाँ थे तब शराब पिने की वजह
से उनकी मृत्यु हो गयी कई लोगों का कहना है की उनको विष दे दिया गया और कई लोगों
का मानना है की अकबर की सेना ने वाराणसी(बनारस) पर आक्रमण कर दिया था और युद्ध में
महाराज प्रतापदित्य श्रीवास्तव वीरगति को प्राप्त हुए थे| महाराज प्रतापदित्य
श्रीवास्तवकी मृत्यु जैसे भी हुई हो परन्तु उनके द्वारा किया कार्य अपने आप में
बहुत बड़ी बात है| परन्तु यह हमारा दुर्भाग्य है की हमे ऐसे महावीर के बड़े में अधिक
नहीं मालूम| अतः मेरा निवेदन है की आप इस ब्लॉग को अधिक से अधिक शेयर करें| और
जैसा की मेने ऊपर बताया कि आप अगर यह ब्लॉग को और मेरे’ अन्य ब्लोगों को सुनना
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30/08/2020
परम कुमार
कक्षा-11
कृष्णा पब्लिक स्कूल
रायपुर,(छ.ग.)
अगर आप सुविचार पढ़ना चाहते हैं तो नीचे दी गई लिंक को दबाएं
https://madhurvichaar.blogspot.com/2020/09/blog-post_91.html
ऊपर दी गयी फोटो इस लिंक से ली गयी है-
https://www.paramkumar.in/2020/08/unidentified-kshatriya-kayastha.html
I didn't knew about such a great warrior thank you Param for making us know, looking further for more such unknown gems of India.
ReplyDeleteBehtareen is umar me itna hunar . Lajawab fantastic
ReplyDeleteNice & Informative blog,got to know new information about Indian Caste System
ReplyDeleteBhai bangal mein shrivastav kahan se aaye maharaja pratapaditya toh basu surnane lagatey they.
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