Monday, 30 July 2018

जय महाकाल
नमस्कार दोस्तों आपका एक बार फिर से मेरे ब्लॉग में हार्दिक स्वागत है |
दोस्तों आज का ब्लॉग मेरे भाई समान मित्र की इच्छा पर लिखा जा रहा है और मेरे उस प्रिय मित्र का नाम है ओजस दुबे |
दोस्तों आज हमारी चर्चा का विषय उससे पर है जिसके ऊपर हाल ही में फिल्मी बनी थी जिसको लेकर काफी विवाद भी हुआ था और काफी जगहों पर इस फिल्म को लगाने की अनुमति भी नहीं दी| यह फिल्म  इसी साल के 25 फरवरी को रिलीज हुई थी| तो इतना पढ़ कर दोस्तों आप तो समझ ही गए होंगे कि यह ब्लॉग महारानी पद्मिनी पर है| परन्तु ऐसा नहीं है, यह ब्लॉग उस महान योद्धा पर है जिसे उस फिल्म में दिखाया तो गया था पर उसे के किरदार के व्यक्तित्व को अच्छे से नहीं बताया जा सका | इसके अलावा यह उन योद्धाओं पर भी है जो अगर उस समय ना होते तो उस समय रावल रतन सिंह जीवित नहीं बचते | जी हां दोस्तों मैं बात कर रहा हूं मेवाड़ राज के महान सेनापति गोरा सिंह चुंडावत की और उनके भतीजे बादल सिंह चुंडावत की|. तो आइए शुरू करते है|
मित्रों यह बात है  सन 1300 ई. की जब रावल रतन सिंहके पिता समर सिंह का देहांत हो जाता है तब रावल रतन सिंह अश्वमेध यज्ञ करने का प्रण लेते है और वो साथ ही-साथ यह प्रण भी लेते हैं की वो  दिल्ली से लेकर दक्षिण में सिंघल द्वीप (श्रीलंका) तक अपना राज बढायेंगे|  ताकि भारत को कोई विदेशी चुनौती ना  दे पाये|  आप सोच रहे होंगे कि मैं यह कैसी बात कर रहा हूँ क्योंकि आज तक आपने किताबों में तो यही पढ़ा होगा कि अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली का राजा था | जो दिल्ली का राजा होता  वह भारत का राजा होता | आप जो सोच रहे हैं वह बिल्कुल सही सोच रहे हैं क्योंकि आपने यह सब आप तक आपने जितनी भी किताबें पढ़ी उसी से जाना  पर शायद आपको यह नहीं पता कि जब तक दिल्ली सल्तनत में तूगलकशाही नहीं आई थी तब तक जितने भी मुसलमान राजाओं ने राज किया भारत पर वह लोग दिल्ली से नहीं बल्कि देवगिरी से राज किया करते थे| तो रावल  रतन सिंह जब यह प्रण लेते हैं कि वह पूरे भारत को एक करेंगे दिल्ली से लेकर दक्षिण में सिंघल द्वीप तक अपना राज फैलाएंगे| तब उन्होंने सन 1301 में अपना प्रण पूरा करने के लिए अश्वमेध यज्ञ आरंभ किया उन्होंने अपने अश्वमेध यज्ञ का आरंभ राजस्थान जो (तत्कालीन राजपूताने के नाम से जाना जाता था) , उसके मारवाड़ की जीत के शुरू किया था मारवाड़ की जीत को देखकर भारत में रावल रतन सिंह के नाम का डर फैल गया था | रावल रतन सिंह को उन सभी राज्यों का समर्थन मिल रहा था, जहां जहां वह अपना राज विस्तार कर रहे थे| इसके साथ ही  उनकी सेना भी बढ़ती जा रही थी और इसीलिए शायद रावल रतन सिंह को ज्यादा युद्ध नहीं करना पड़ा  था क्योंकि उनकी इतनी विशाल सेना का सामना करने का साहस हर किसी में नहीं था|  तो उनको दक्षिण तक  पहुंचने  में  कोई  परेशानी  नहीं  हुई|  जब  वह  दक्षिण के रामेश्वरम पहुंचे तो रात में उन्होंने  रामेश्वरम के  तट  पर अपना खेमा लगाया और रावल रतन सिंह फिर अपनी दिन की रणनीति पर विचार विमर्श कर के सोने चले गए| इसके कुछ देर बाद वहां पर एक तोता उडते हुए आ गया और पद्मिनी-पद्मिनी बोलने लगा| जिससे राजा की नींद खुल गयी उन्होंने उस तोते से पूछा हे हरे रंग के प्राणी तेरा क्या नाम हे तोते ने बताया मेरा नाम हिरामल है मै राजकुमारी पद्मिनी का तोता हूँ वो इस दुनिया की सबसे सुन्दर स्त्री हैं |
मित्रों आज  भी  यह  कहा  जाता है कि विश्व  में  उनसे  ज्यादा  सुंदर  महिला  आज तक  पैदा  नहीं  हुई  बस  एक  ही  दिक्कत  थी  कि शादी नहीं हो पा रही थी|  इतना सब सुनकर रावल राजा और सिंह ने यह फैसला किया कि वह अपने चुनिंदा 17000 सिपाहियों के साथ सिंघल दीप जाएंगे दूसरे दिन फिर राजा ने सिंहल द्वीप के तरफ अपने विश्वसनीय 17000 सिपाहियों के साथ प्रस्थान किया| प्रस्थान करने के ही दूसरे दिन वह सिंगल में पहुंच गए थे| सिंहल द्वीप में उनका भव्य स्वागत हुआ वहां के राजा गंधर्व सेन ने कहा हे राजा आप मेरी बेटी के स्वयंवर में आए उसके लिए आपका धन्यवाद| महाराज आपको मेरी बेटी से शादी करने के लिए कुछ परीक्षाएं देनी पड़ेगी, जो आज के स्वयंवर में रखी गई हैं, रावल रतन सिंह ने कहा ठीक है महाराज मैं उन सभी परीक्षाओं को पार करने के लिए तैयार हूँ |  परीक्षा यह थी  की एक बहुत बेहतरीन लड़ाका था जो आज तक किसी से हारा नहीं था उसे हराना था| सब राजाओं ने  अपना दम लगा दिया उस वीर को हराने में कोई उसे हरा नहीं पाए तब रावल रतन सिंह उस योद्धा से युद्ध करने के लिए अये | उस योद्धा में  और रावल रतन सिंह में युद्ध शुरू हुआ अंत में उन्होंने उस योद्धा को पराजित कर दिया | दोस्तों वह योद्धा और कोई नहीं स्वयं राजकुमारी पद्मिनी थी | पद्मिनी ने कहा पिताश्री जो आदमी मेरी रक्षा कर सकता मैं उसी उसी से ही विवाह करूंगी | तो अंत में इस तरीके से रावल और सिंहऔर पद्मिनी का विवाह तय हुआ| जब विवाह हो गया तब सिंहल द्वीप के राजा गंधर्वसेन ने और सिंह से पूछा कि हे राजन आप को दहेज में क्या चाहिए तो राजा ने उत्तर दिया कि मुझे दहेज में तो कुछ नहीं चाहिए पर मेरे साथ जो यह 17000 सिपाही आए हैं आप इनकी भी शादी करवा दीजिए यह उन्होंने राजागंधर्वसेनसे दहेज के रूप में मांगा|राजागंधर्वसेन ने इसको पूरा किया और उन सभी 17000 सिपाहियों का विवाह करवा दिय इसके बाद रावल रतन  सिंह वापस चित्तौड़ गए वहां पहुचके उन्होंने जो प्रतिज्ञा ली थी की दिल्ली से सिंघल द्वीप तक अपना राज लाएंगे पूर्ण किया और अश्वमेघ यज्ञ में अंतिम आहुति डाली|
रावल रतन सिंह के एक गुरु थे जिनका नाम था राघव चेतन| जो मेवाड़ राजघराने के राजगुरु भी थे| विवाह के बाद सबसे पहले रतन सिंह और महारानी पद्मिनी उन्हीं से मिलने गए  महारानी पद्मिनी को देखते ही राघव चेतन उन पर मोहित तो गए| अपने इस कृत्य के कारण एक दिन उसने रानी को नहाते हुए देखने की कोशिश की पर वह पकड़े गए और सिंह ने उन्हें महल से निष्कासित करने का आदेश दिया तभी एक सैनिक ने रावल रतन सिंह को  खबर दी कि राघव चेतन पंडित नहीं बल्कि एक तांत्रिक था और उस समय राजपूताने में, ना सेना में, ना ही महलों में, तांत्रिक को रखने की अनुमति थी| रावल रतन सिंह के समय में तांत्रिक सेना में हिस्सा नहीं ले सकते थे और वह ना ही महल के किसी उच्च पद या किसी भी पद पर विराजित तो सकते थे| तो रावल रतन सिंह ने उन्हें पंडित होने से बहीष्कार  करते हुए राजपूताने से निकाल दिया|
अपने अपमान का बदला लेने के लिए राघव चेतन देवगिरी के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के पास मदद मांगने गया | अलाउद्दीन खिलजी थोड़े ही समय पहले अपने चाचा यानी जलालुद्दीन खिलजी को मार के राजा बना था| जलालुद्दीन खिलजी कि लड़की से अलाउद्दीन कि शादी हुई थी| अलाउद्दीन खिलजी का एक बहुत खास आदमी था जिसका नाम था मोहम्मद कंफुर|
राघव चेतन ने जब अलाउद्दीन खिलजी से मदद मांगी पर अलाउद्दीन खिलजी राजपूतों से काफी भयभीत रहते थे| उन्होंने उनकी सहायता करने से मना कर दिया तब राघव चेतन ने अलाउद्दीन खिलजी को कहा की अगर आप चित्तोड पर आक्रमण कर के उसे जीत लेते हैं तो आप को ना केवल खजाना मिलेगा बल्कि आप को वहां एक खुबसूरत रानी भी मिलेगी| यह सुनकर खिलजी ने कहा की मै केवल खजाने और रानी के लिए राजपूतों से दुश्मनी क्यों मोल लूं मेरे पास नहीं पैसे की कमी हे और नहीं रानियों की| फिर राघव चेतन ने खिलजी को सम्मोहित करके अपने आंखों द्वारा पद्मिनी की एक तस्वीर उन्हें दिखाई और कहा हे राजन मैं केवल अपने बदले के लिए आपके पास नहीं आया हूं बल्कि आपके फायदे के लिए भी आपके पास आया क्योंकि आपने अभी जिस महिला का चित्र मेरी आंखों के द्वारा देखा वह इस दुनिया की एकमात्र सबसे सुंदर औरत, इतना ही नहीं अगर आप चित्तौड़ को विजय ही कर लेते हैं तो आपको तीन रत्न प्राप्त होंगे जिनकी कीमत इस दुनिया में सबसे ज्यादा अनमोल है| सब सुनने के बाद अलाउद्दीन खिलजी राघव चेतन के भड़काने में आ गया और उसने मेवाड़ जो उस समय की एक सबसे बड़ी सल्तनत बन चुकी थी उसके खिलाफ हमला का आदेश दे दिया और इस युद्ध में मोहम्मद कंफुर ने और बिहार के मुसलमान शासक ने अलाउद्दीन खिलजी का साथ दिया|
सन 1302 में फरवरी के बाद गर्मी वाले मौसम में अलाउद्दीन की सेना ने चित्तौड़ के उपर हमला कर दिया| उन्होंने चित्तोड़ को तो घेर लिया था पर वह यह भूल चुका था कि वह महल के बाहर जहां पर गर्मी उनके प्राण ले लेगी और रावल रतन सिंह और उनकी सेना महल के अंदर वहां पर उनके पास ना ही खाने की कमी थी ना ही पीने की ऐसे ही ऐसे समय बीता जाए होलिका दहन का दिन आ गया होलिका के उपहार के रूप में रावल रतन सिंहने अपने सैनिकों द्वारा अग्निबाण की वर्षा अलाउद्दीन खिलजी के खेमों पर करवा दी और अलाउद्दीन खिलजी के खेमों को जला दिया जिसकी वजह से उसके काफी सैनिक मारे गए और उसका प्रिय साथी मोहम्मद कंफुर भी जख्मी हो गया उसने अपनी सेना का इतना नुकसान देख कर यह फैसला लिया कि वह रतन सिंह को बल से नहीं बल्कि छल से पराजित करेगा और उसने रतन सिंह के किले के अंदर यानि चित्तौड़ के किले में एक पत्र भिजवाया की वह बस एक बार पद्मिनी को देखना चाहते हैं और उनके साथ मिलकर भोजन करना चाहते हैं और इससे पहले वह अपनी सारी सेना वापस महल भेज देगी,रतन सिंह ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और अलाउद्दीन खिलजी को महल में भोजन का आमंत्रण दे दिया अलाउद्दीन खिलजी ने महल का आमंत्रण स्वीकार किया| इसके बाद उन्होंने खिलजी को अपना पूरा महल दर्शन करवाया रतन उसके साथ बैठ के भोजन किया| यह सब आदर सत्कार तो जाने के बाद  खिलजी ने रावल रतन सिंह से कहा कि मैं अपकी रानी का एक बार दर्शन करना चाहता हूँ | यह सुनकर रतन सिंह के सेनापति गोरा सिंह ने खिलजी के गर्दन पर तलवार रख दी और कहा महाराजा मुझे बोलने का हक़ नहीं है पर कोई विदेशी लुटेरा हमारी महारानी को एसे भी क्यों देखे| यह सुनकर रतन सिंह ने कहा की तुम राजनीती नहीं जानते तो हर बार बात बात में तलवार निकल लेते हो| तो, चलो तलवार अन्दर डालो अपना यह अपमान देख कर गोरा चित्तोड का किला छोड के चले गए | आखिर रतन सिंह खिलजी को जल महल में लेकर गए जल महल के ऊपरी हिस्से में एक शीशा लगा था उन्होंने अलाउद्दीन खिलजी से कहा कि आप उस शीशे में देखें आपको मेरी पत्नी रानी पद्मिनी की झलक दिख जाएगी और उन्होंने पद्मिनी को आने का इशारा किया जल महल के दूसरी तरफ के महल में पद्मिनी ने अपना प्रतिबिंब पानी में डाला और वह प्रतिबिंब और दूसरों शीशों से टकरा ने के बाद जल महल के शीशे में आया| जिसको देखकर अलाउद्दीन खिलजी हैरान हो गया और उसने मन में ही सोचा कि अगर यह रानी शीशे में इतनी सुंदर दिखती तो असलियत कितनी सुंदर दिखती होगी और वह तुरंत पीछे मुड़ा पर पद्मिनी तुरंत अंदर चली गयी| ( यह पढ़कर आप सोच रहे होंगे की रावल रतन सिंह बहुत कमजोर थे इस लिए उसने खिलजी को पद्मिनी की झलक शीशे मैं दिखा दी पर एसा नहीं यह उन्होंने रानी की झलक शीशे में इसलिए दिखाई क्योंकि अथिति भगवान होता यह और भगवान  की हर इच्छा पूरा करना मेजबान का फर्ज होता है) इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी ने रतन सिंह से कहा हे राजन अब मैं वापस दिल्ली चलता हूं आपके भोज के लिए हार्दिक धन्यवाद| तब रतन सिंह ने खिलजी से कहा कि हमारे हिंदू धर्म में यह रिवाज यह कि आए हुए मेहमान को दरवाजे तक छोड़ा जाता है | खिलजी यह बात जानता था इसलिए उसने पहले से ही 1 जाल बना के रखा हुआ था जैसे ही रावल रतन सिंहजी खिलजी को बाहर तक छोड़ने के लिए आए खिलजी के कुछ सिपाहियों ने तुरंत उन्हें कैद कर लिया और अपने साथ दिल्ली लेकर चले गया|
जब यह बात मेवाड़ वासियों को पता चली तो उनमें अफरा तफरी मच गई और खिलजी ने दिल्ली से एक पत्र भिजवाया जिसमें उसने लिखा था कि अगर तुम अपने महाराज की भलाई चाहते तो तो तुम अपनी महारानी पद्मिनी का विवाह मुझ से करवा दो यह सुनने के बाद मेवाड़ के राजपूतों में खून की तेजी और भी तेज हो गयी थी और उन सब ने यह फैसला किया कि वह देवगिरी पर आक्रमण करके खिलजी को समाप्त कर देंगे क्योंकि राजपूतों का बल उस समय खिलजी से अधिक था तब पद्मिनी ने उन सब को कहा आप लोग तो मेरे से इतने बड़े और बुद्धिमान यह तब भी आप लोग ऐसी बात कैसे कर सकते हैं हमारे देवगिरी पर हमले की खबर सुनते ही वह रतन सिंह को मार देगा और हमारे राजा की मृत्यु हो जाएगी| तब उन्हीं ने पूछा तो आप ही बताइए कि हम क्या करें तब पद्मिनी ने कहा हम लोग अपने महाराज को वापस लाएंगे पर एक रणनीति के द्वारा और उसके लिए उन्होंने ने सबसे पहले मेवाड के सेनापति गोरा सिंह को बुलाया (जो शुरू से ही खलजी को महल में बुलाने के विरुद्ध थे और महल में तो खिलजी को मारने के लिए उठ खड़े हुए थे) रानी ने  उनसे मदद मांगी और उनके पैर पर गिर गयीं तब गोरा ने कहा की यह आप क्या कर रहीं है आप शिशोधीया कुल की महारानी हैं आप निश्चिंत होकर महल में बैठें हम रावल जी की मुक्त कर के लायेंगे| फिर रणनीति बनाई गई जिसके अनुसार उन्होंने अपने भतीजे बादल सिंह चुंडावत को बुलाया और कहा खिलजी के पास पत्र भेज दो की पद्मिनी देवगिरी आयेंगी पर एक शर्त है कि वो अपने साथ अपनी 700 सहेलियां भी लायेगि और देवगिरी पहुचते ही हमें पहले रावल रतन सिंह से मिलना है इतना सब पत्र मैं लिखने के बाद बादल ने पत्र देवगिरी भेज दिया| योजना यह थी की एक लोहार पद्मिनी के वेश भूषा मैं पद्मिनी कि जगह उनकी डोली में बैठ के जायेगा| ताकि वो रतन सिंह के बंधन कट सके और’ यह केवल 700 सेनिक नहीं बल्कि 3500 ससैनिक देवगिरी जायेगे जिसमे 700 सैनिक लड़कियों की वेश भूषा पहनके डोली मैं बैठेंगे| पद्मिनी ने स्वयं गोरा और बादल का तिलक किया और उन्होंने देवगिरी की और प्रस्थान किया| उधर खिलजी को भी राजपूतों का पत्र मिल चूका था और उसने दोनों शर्त मंजूर कर ली फिर एक दिन राजपूतों की सेना देवगिरी पहुच गयी| और शर्त के अनुसार पद्मिनी (लोहार) सबसे पहले रतन सिंह से मिलने गया वहां पर उसने रतन सिंह के बंधन काटे और उन्हें मुक्त किया| बहार आते रतन सिंह गोरा से गले मिले और उनसे माफ़ी मांगी| गोरा ने कहा महाराजा यह माफी मांगने का समय नहीं हैं आप तुरत यहाँ से निकिलिये रतन सिंह ने बहुत मना किया पर गोरा और बादल ने उन्हें कैसे भी  समझा के चित्तोड वापस भेज दिया| पर यह बात मोहमद जफ़र को पता चल गयी और उसने तुरंत यह तो खिलजी को बता दी यह तो सुनते ही खिलजी ने युद्ध की घोषणा कर दी| उन 3500 राजपूतों और खिलजी के सेनिकों में घनघोर युद्ध चालू तो गया| गोरा का सामना महोमद जफ़र से हुआ तो गोरा उसको देखते ही आगबबुला तो गया और दोनों में घमासान युद्ध चालू हो गया | दूसरी ओर बादल भी घनघोर युद्ध कर राहा था| तभी खिलजी के एक सैनिक ने गोरा के पैर पर तलवार मार दी’ और गोरा गिर गए वो जैसे ही गिरे कंफुर ने उनका सर काट दिया पर वो भूल चूका था की कुत्ता केवल अपने घर में शेर होता हे पर शेर हर जगह शेर होता है| उस बिना सर के शरीर ने (केवल धड़ ने) कंफुर को मार दिया | अपने चाचा का शीश देख कर बादल का क्रोध अपनी चरम सीमा पर पहुच गया और वो खिलजी के सैनिकों को गाजर मूली की तरह काटना शुरू कर दिया तभी एक तीर उन्हें लगा और बादल सिंह की मृत्यु हो गयी | इसके बाद  ही धीरे धीरे सब राजपूत योद्धा मारे जाने लगे| पर उनके महाराजा यानि रतन सिंह जिवीत थे| खिलजी ने मेवाड के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी|
और दुसरी तरफ राजपूताने में चप्निया परदेश के 56 राठौर राजाओं ने विद्रोह कर दिया था| जिसको नियंत्रित कर ने के लिए रावल रतन सिंह ने अपने भतीजे को 300000 की सेना के साथ रवांना किया| इस तो का फायदा उठा के खिलजी ने 97000 की सेना के साथ चित्तोड पर आक्रमण कर दिया अब चित्तोड में मात्र 40000 की सेना थी| अब इसे हालत मैं राजपूतों ने साका करने का फेसला किया और स्त्रियों ने जौहर का निर्णय किया| अगले दिन सभी पुरुष  केसरिया पगडी पहन के साका के लिए तैयार हो  गए| सुबह के 6 बजे स्त्रियों ने पद्मिनी के साथ में जोहर कर लिया और सात बजे किले के दरवाजे खोल दिए गए| राजपूतों हर-हर महाद्देव के जय घोष किया| और युद्ध आरंभ कर दिया|
मैं इस युद्ध का वर्णन  नहीं कर सकता पर कोशिश करता हूँ|
23 मार्च 1303 को हुए उस युद्ध ने पुरे राजपूताने को हिला दिया| राजपूतों की उस वीरता का केवल अनूभव किया जा सकता उस दिन एक–एक राजपूत 100-100 पे भारी पढ़ रहा था राजपूतों का यह पराक्रम देख के खिलजी की सेना मैं डर की भावना आ रही थी| राजपूत लगातार हर-हर महाद्देव, जय राजपुताना, जय एकलिंगनाथ जैसे जयघोष लगा रहे थे की तभी एक सेनिक ने धोखे से रावल रतन सिंह को घोडे से गिरा दिया| रतन सिंह जब गिरे तब उनके पेट मैं भला घुस गया था| पर उनकी मृत्यु नहीं हुई थी वह खिलजी की तरफ बढे और खिलजी पर एक वार किया जिससे वह घायल हो गया | तभी एक तीर उन्हें लगा जिससे उनकी मृत्यु हो गयी|
एक खास बात पद्मावत पिक्चर में दिखाया गया की रतन सिंह को मोहमद कंफुर ने तीर चला के मारा था पर एसा नहीं था रतन सिंह की मृत्यु एक मामूली सैनिक के तीर से हुई थी|
    तो दोस्तों ऐसा था महावीर रतन सिंह , सेनापति गोरा सिंह चुण्डावत और उनके भतीजे बादल सिंह का साहस| दोस्तों इतना पढके आप समझ ही गए होंगे की रावल रतन सिंह के पास उस समय अगर अपनी पूरी सेना होती तो वो खिलजी का नामो निशान इस दुनिया से मिटा देते| रावल रतन भी अन्य राजपूत योद्धाओं की तरही वीर थे इनका राज्य 34,50,288किलोमीटर स्क्यार था|
अगर आप को यह ब्लॉग अच्छा लगे तो कमेंट रतन शेयर करें तथा कोई भी प्रश्न तो नीचे कमेंट कर के पूछें|

                            जय भारत
धन्यवाद्
30\07\2018
                                                       परम कुमार
                                                       कक्षा-9
                                                 कृष्णा पब्लिक स्कूल
                                                     रायपुर
          

ऊपर दी गयी फोटो इस लिंक से ली गयी है

1-https://hindi.starsunfolded.com/rawal-ratan-singh-hindi/

2-http://www.holidayiq.com/destinations/udaipur/photos/p5.html#341481


5 comments:

  1. Very Nice Information.
    Keep it up.

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  2. Very good, bahut accha laga padhker, bahut si nai jankari mili, aise hin likhte raho👍👍👍💯💯💯💯

    ReplyDelete
  3. परम के प्रत्येक ब्लॉग के हर शब्द पर ठहर कर पढने से ही ब्लॉग की गूढ़ता को समझना सम्भव है।राजा रावल रतन सिंह, गोरा और बदल की अद्वितीय वीरता से अवगत हो कर अपने इतिहास पर गव र्होता है। साथ ही दुख होता है कि सिद्धान्तों और आदर्शों का एकतरफा पालन करने की कीमत अपूर्णनीय हानि के रूप में चुकानी पड़ी।Eye opening blog के लिए परम को बहुत बहुत बधाई।

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